संस्कार


परिभाषा

  • संस्कार अनुभवों के परिणाम स्वरूप चित्त (स्मृति पटल) पर पड़ने वाली वह गहरी छाप या संचित नादरचना है जो जीव की प्रवृत्तियों, आदतों और कर्मों को जन्म देती है।
  • यह चित्त में अनुभवों के संचय का क्रियात्मक रूप है।

मुख्य शिक्षाएं

  • जब स्मृति में अर्थपूर्ण नादरचनाएं संचित हो जाती हैं, तो वे कर्मेन्द्रियों के माध्यम से वास्तविक और अर्थपूर्ण कर्म में परिवर्तित होती हैं। बिना स्मृति और संस्कार के कोई कर्म संभव नहीं है।
  • संस्कार ही जीव के पूर्वजन्मों और वर्तमान जीवन के बीच सेतु का कार्य करते हैं (कारण शरीर के अंतर्गत); इसी संचय के कारण वासनाओं और प्रवृत्तियों का पुनः जन्म होता है।
  • ज्ञानमार्ग के अनुसार, अज्ञान की अवस्था में नए भ्रामक संस्कार बनते हैं जो जीव को बंधनों में फँसाते हैं। आत्मज्ञान होने पर पुराने संस्कारों का क्षय होने लगता है और नए भ्रामक संस्कार बनने बंद हो जाते हैं।
  • साधक निदिध्यासन और साक्षीभाव के द्वारा अपने चित्त के विकारों और अशुद्ध संस्कारों को शुद्ध करता है।

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