परिभाषा
- ज्ञानमार्ग पर पुरुष को अनुभवकर्ता, साक्षी या दृष्टा का ही दार्शनिक पर्याय माना गया है।
मुख्य शिक्षाएं
- पुरुष नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है; यह प्रकृति के परिवर्तनों से कभी प्रभावित या लिप्त नहीं होता, फिर भी अज्ञानवश स्वयं को बुद्धि-शरीर की क्रियाओं का कर्ता मान लेता है।
- पुरुष और प्रकृति का वास्तविक भेद समझ लेना (दृश्य-दृष्टा विवेक) ही अज्ञान के नाश और मुक्ति का परम साधन है।
- सांख्य दर्शन में पुरुष को अनेक (प्रत्येक शरीर में अलग) माना गया है, जो कि अद्वैत वेदांत और ज्ञानमार्ग के सत्य के विरुद्ध है।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, संपूर्ण अस्तित्व में केवल एक ही अखंड अनुभवकर्ता (पुरुष) व्याप्त है, जो सभी शरीरों के माध्यम से स्वयं का ही अनुभव कर रहा है।