आत्मज्ञान


परिभाषा

  • यह उस अज्ञान का पूर्ण विनाश है जिसके कारण जीव स्वयं को शरीर या मन मान बैठता है।

मुख्य शिक्षाएं

  • आत्मज्ञान का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति परिवर्तित होकर अनुभवकर्ता हो जाता है; बल्कि केवल यह जानना है कि मैं अहम् या मनोशरीर यंत्र नहीं हूँ, अपितु केवल साक्षी हूँ।
  • नेति-नेति (यह भी नहीं, वह भी नहीं) विधि के द्वारा जब शरीर, मन, इंद्रियां, विचार, भावनाएं और स्मृति आदि को खुद से पृथक जान लिया जाता है, तब अचल तत्व स्वतः प्रकाशित होता है।
  • आत्मज्ञान होने पर जीव के भीतर विरक्ति, अनासक्ति, निर्भयता और गहन शांति का उदय होता है। सबसे बड़ा भय यानी मृत्यु का डर भी यहाँ समाप्त हो जाता है।
  • आत्मज्ञान ही वास्तविक मुक्ति है, जिसके बाद मनुष्य जन्म-मृत्यु के सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है।

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