परिभाषा
- संसार जन्म, वृद्धावस्था, दुःख, पीड़ा और मृत्यु का वह अंतहीन चक्रव्यूह है जिसमें जीव अपने मूल अज्ञान और कर्म-संस्कारों के कारण निरंतर भाग-दौड़ और संघर्ष करता रहता है।
- यह जीव के अनुभवों का वह क्षेत्र है जहाँ वह स्वयं को शरीर-मन के बंधनों में फँसा हुआ पाता है।
मुख्य शिक्षाएं
- संसार कोई बाह्य भौगोलिक स्थान या वस्तु नहीं है; स्वयं को शरीर या मन मान बैठना ही संसार का मूल कारण है ('मैं शरीर हूँ, यही मानना ही संसार है')।
- जब तक इंद्रियों द्वारा कल्पित अनुभवों और सांसारिक प्रपंचों में जीव की तीव्र आसक्ति रहती है, तब तक संसार का यह भ्रामक चक्र चलता रहता है।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, सारा संसार और उसके संबंध केवल स्मृति पर आधारित नादरचनाएं (माया) हैं, जो निरंतर परिवर्तनशील होने के कारण परमार्थतः असत्य हैं।
- संसार के चक्रव्यूह से विरक्त होना (वैराग्य) ही आध्यात्मिक प्रगति का आवश्यक चरण है, और अपने सत्य स्वरूप अनुभवकर्ता को जान लेना ही संसार से परम मुक्ति है।