परिभाषा
- अहिंसा चित्त की रचनाओं और किसी भी प्राणी को किसी भी स्तर पर हानि या चोट न पहुँचाने की स्थिति है। यह केवल 'अच्छा करने' की चेष्टा नहीं है, बल्कि हिंसा का पूर्ण अभाव ही अहिंसा है।
- ज्ञानमार्ग पर अहिंसा को ही परम नैतिकता और सर्वोत्तम आचरण माना गया है।
मुख्य शिक्षाएं
- हिंसा का अर्थ केवल शारीरिक रूप से किसी को मारना-पीटना ही नहीं है; बल्कि वाणी से किसी को कटु वचन कहना, गाली देना, अपमान करना और मन में किसी के प्रति नफरत, ईर्ष्या, क्रोध या द्वेष का विचार लाना भी हिंसा है।
- शारीरिक, वाचिक और मानसिक - इन तीनों स्तरों पर होने वाली हिंसा के सर्वथा अभाव को ही वास्तविक अहिंसा कहा जाता है।
- अहिंसा का अर्थ न केवल मनुष्यों और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील होना है, बल्कि हमारे चारों ओर दिखाई देने वाली भौतिक और अभौतिक (मानसिक) संरचनाओं को भी किसी भी प्रकार की क्षति न पहुँचाना है।
- जब साधक को आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान होता है कि 'सभी मेरे ही रूप हैं और सबका तत्व एक ही है', तब किसी अन्य के प्रति हिंसा का भाव स्वतः समाप्त हो जाता है और अहिंसा स्वाभाविक आचरण बन जाती है।
- अहिंसा सत्य और पूर्णता के मार्ग पर चलने की सर्वोत्तम विधि है, जो साधक को बिना किसी बनावटी प्रयास के सहज रूप से मुक्ति और सुख की ओर ले जाती है।