दृश्य दृष्टा विवेक
परिभाषा
- दृश्य दृष्टा विवेक (या दृश्य-दृष्टा विवेक) अद्वैत दर्शन का वह अत्यंत महत्वपूर्ण नियम और अभ्यास है जो यह स्पष्ट करता है कि दृश्य (अनुभव) और दृष्टा (अनुभवकर्ता) दो सर्वथा विपरीत और परस्पर अनन्य श्रेणियाँ हैं।
- इस विवेक के द्वारा साधक स्वयं को दृश्य प्रपंचों से अलग करके दृष्टा स्वरूप में स्थापित करता है।
मुख्य शिक्षाएं
- इस नियम के अनुसार, जो दृश्य (अनुभव) है वह कभी दृष्टा (अनुभवकर्ता) नहीं हो सकता, और जो दृष्टा है उसका कभी बाह्य अनुभव नहीं किया जा सकता (जैसे आँख सबको देखती है पर स्वयं को नहीं देख सकती)।
- अज्ञानी व्यक्ति इस विवेक के अभाव में दृश्य को ही दृष्टा मान लेता है; जैसे स्वयं को शरीर या मन समझ बैठना और अनुभवकर्ता का कोई दृश्य या चमत्कारिक अनुभव खोजने का निरर्थक प्रयास करना।
- शरीर, इंद्रियां, विचार, भावनाएं, और स्वयं अहम् भी अनुभव होने के कारण केवल 'दृश्य' हैं, इनके होने को प्रकाशित करने वाला चैतन्य प्रकाश ही एकमात्र 'दृष्टा' है।
- इस विवेक को दृढ़ता से अपने जीवन में उतारने से ही साधक का मूल अज्ञान नष्ट होता है, जिससे वह साक्षीभाव में प्रतिष्ठित होकर परम मुक्ति प्राप्त करता है।
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