परिभाषा
- प्रगति के लक्षण वे व्यावहारिक, बौद्धिक और आंतरिक मानसिक संकेत हैं जो यह दर्शाते हैं कि साधक का चित्त शुद्ध हो रहा है और वह अज्ञान के बंधनों से मुक्त होकर सत्य में प्रतिष्ठित हो रहा है।
मुख्य लक्षण
- विरक्ति में स्वाभाविक वृद्धि — सांसारिक आकर्षणों, विलासिताओं, संबंधों और व्यसनों के प्रति आसक्ति का स्वतः ही समाप्त हो जाना।
- चित्त में गहन और अचल शांति का उदय होना — पहले जो विपरीत परिस्थितियां क्रोध, घबराहट या दुःख देती थीं, अब वे साधक को विचलित नहीं करतीं।
- निर्भयता का जाग्रत होना — जीवन के सबसे बड़े भय यानी मृत्यु का डर पूरी तरह समाप्त हो जाना, क्योंकि साधक को यह बोध हो जाता है कि 'मैं अजन्मा और अमर हूँ'।
- बौद्धिक प्रज्ञा का विकास — सांसारिक बुद्धि का आध्यात्मिक विवेक में बदल जाना, जिससे सही-गलत और सत्य-असत्य का भेद स्वतः स्पष्ट होने लगता है।
- सुख और दुःख में समता का भाव आना तथा संपूर्ण जीवन का आनंद की पृष्ठभूमि में सहजता से चलना।