प्रारब्ध


परिभाषा

  • प्रारब्ध संचित कर्म और संस्कारों का वह क्रियाशील भाग है जो जीव के वर्तमान जीवन की परिस्थितियों, शरीर, मुख्य वासनाओं और अनिवार्य अनुभवों का निर्धारण करता है।
  • प्रारब्ध का सहजता से पूर्ण होना ही मनुष्य जीवन से मुक्ति का मार्ग सुलभ करता है।

मुख्य शिक्षाएं

  • ज्ञानमार्ग के अनुसार, जब तक यह भौतिक शरीर विद्यमान है, तब तक जीव को अपना प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है, क्योंकि यह शरीर प्रारब्ध की ही यांत्रिक अभिव्यक्ति है।
  • आत्मज्ञानी प्रारब्ध के अनुकूल या प्रतिकूल फलों को भोगते हुए भी साक्षीभाव में रहता है, जिससे नए कर्मों का निर्माण (आगामी कर्म) नहीं होता।
  • जब जीव का प्रारब्ध पूर्ण हो जाता है और उसकी मुख्य इच्छाएं शांत हो जाती हैं, तो मनुष्य देह से स्वतः ही निर्वाण या आत्यंतिक मुक्ति हो जाती है।
  • प्रारब्ध के वेग को बदला नहीं जा सकता, परंतु ज्ञान के प्रभाव से दुःख और पीड़ा के मानसिक प्रभाव को पूरी तरह शांत किया जा सकता है।

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