परिभाषा
- मन चित्त की विभिन्न परतों में उठने वाले व्यक्तिनिष्ठ और अभौतिक अनुभवों (जैसे विचार, भावनाएं, इच्छाएं, स्मृतियां और कल्पनाएं) का एक सुव्यवस्थित समूह है।
- ज्ञानमार्ग पर, मन कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं बल्कि चित्त की ही परिवर्तनशील वृत्तियों का प्रवाह मात्र है।
मुख्य शिक्षाएं
- मन कोई ठोस भौतिक वस्तु नहीं है; यह केवल अत्यंत तीव्र गति से चलने वाली उन नादरचनाओं का समूह है जो इंद्रियों की बाह्य पहुँच के पार (अभौतिक) प्रतीत होती हैं।
- अज्ञान के कारण जीव स्वयं को मन की विभिन्न अवस्थाओं (जैसे सुख, दुःख, राग, द्वेष) से जोड़कर 'मैं' मान लेता है, जबकि मन स्वयं अनुभवकर्ता के पटल पर दिखने वाला केवल एक दृश्य मात्र है।
- मन का मूल आधार स्मृति है; स्मृतियों के चक्र और संचित संस्कारों के कारण ही मन में निरंतर गति और विचारों की श्रृंखला चलती रहती है।
- आत्मज्ञान होने पर साधक मन की इन क्षणभंगुर वृत्तियों से तटस्थ हो जाता है और यह साक्षात जान लेता है कि 'मैं मन नहीं, बल्कि मन का अचल साक्षी हूँ'।